
सम्पद्येत दिन-द्वयं यदि सुखं, नो भोजनादेस्तदा;
स्त्रीणामप्यतिरूपगर्वितधिया,-मङ्गं शवाङ्गायते ।
लावण्याद्यपि तत्र चंचलमिति, श्लिष्टं तत्तद्गतां;
दृष्ट्वा कुंकुमकज्जलादिरचनां, मा गच्छ मोहं मुने !12॥
रूप-गर्विता नारी को यदि, दो दिन भी भोजन न मिले ।
तो मुर्दे जैसा हो जाए, तन उसका किञ्चित् न हिले॥
उसके तन की सुन्दरता भी, चंचल अरु क्षणभंगुर है ।
अत: यति लख कुंकुम-काजल की रचना मत मोह करो॥
अन्वयार्थ : रूप से अत्यन्त घमण्डयुक्त है बुद्धि जिनकी, ऐसी स्त्रियों को यदि दो दिन भी भोजनादि से सुख न मिले अर्थात् यदि वे दो दिन भी न खावें तो उनका शरीर, मुर्दे के शरीर समान जान पड़ता है । उन स्त्रियों के शरीर में मौजूद जो लावण्य है, वह भी चंचल अर्थात् क्षण भर में विनाशीक है; इसलिए हे मुनियों! उन स्त्रियों के शरीर में केसर, काजल आदि की रचना देख कर मोहित मत होओ ।