
रम्भास्तम्भमृणालहे शशभृत्, नीलोत्पलाद्यै: पुरा;
यस्य स्त्रीवपुष: पुर: परिगतै:, प्राप्ता प्रतिष्ठा न हि ।
तत्पर्यन्तदशां गतं विधिवशात्, क्षिप्तं क्षतं पक्षिभि:;
भीतैश्छादितनासिकै: पितृवने, दृष्टं लघु त्यज्यते ॥13॥
केले का स्तम्भ कमल का तन्तु स्वर्ण अरु नीलकमल ।
चन्द्र आदि सब फीके हो जाते, हैं जिस तन के सन्मुख॥
मृतक दशा में उसे फेंक दे, पक्षी क्षत-विक्षत करते ।
हो भयभीत नाॅक को ढाकें, पुरुष उसे तत्क्षण तजते॥
अन्वयार्थ : जिस स्त्री के शरीर के सामने केलों के स्तम्भ, कमल के तन्तु, बर्फ, चन्द्रमा और नीलकमल आदि ने भी पहले प्रतिष्ठा नहीं पाई थी; वह स्त्री का शरीर, जिस समय मृत हो जाता है और श्मशान भूमि में फेंक दिया जाता है तथा जब पक्षीगण, उसके टुकड़े-टुकड़े कर देते हैं, उस समय वह देखा हुआ शरीर भी भयभीत तथा जिनकी नाक ढ़की हुई है - ऐसे मनुष्यों के द्वारा शीघ्र ही छोड़ दिया जाता है ।