+ स्त्री का शरीर, मूढ़बुद्धि पुरुषों को ही आनन्द देने वाला -
अङ्गं यद्यपि योषितां प्रविलसत्, तारुण्यलावण्यवद्;
भूषावत्तदपि प्रमोदजनकं, मूढात्मनां नो सताम् ।
उच्छूनैर्बहुभि: शवैरतितरां, कीर्णं श्मशानस्थलं;
लब्ध्वा तुष्यति कृष्णकाकनिकरो, नो राजहंसव्रज: ॥14॥
यद्यपि नारी अंग मनोहर, तरुण और लावण्य सहित ।
तो भी मूर्खों को प्रिय लगते, चतुर पुरुष को कभी नहीं॥
जैसे सड़े हुए मुर्दों से, व्याप्त श्मशान भूमि में जा ।
काले कौए ही खुश होते, राजहंस तो कभी नहीं॥
अन्वयार्थ : यद्यपि स्त्रियों का शरीर, मनोहर यौवनावस्था तथा लावण्य से सहित और अनेक प्रकार के आभूषणों से भूषित है; तथापि वह मूढ़बुद्धि पुरुषों को ही आनन्द देने वाला है, सज्जन पुरुषों को नहीं । जिस प्रकार सड़े हुए अनेक मुर्दों से व्याप्त श्मशान भूमि को प्राप्त होकर, काले काकों का समूह ही सन्तुष्ट होता है, राज-हंसों का समूह नहीं ।