
कार्याकार्यविचारशून्यमनसो, लोकस्य किं ब्रू हे;
यो रागान्धतयादरेण वनिता,-वक्त्रस्य लालां पिबेत् ।
श्लाघ्यास्ते कवय: शशांकवदिति, प्रव्यक्तवाग्डम्बरै:;
चर्मानद्ध-कपालमेतदपि यै,-रग्रे सतां वर्ण्यते ॥16॥
अरे! राग में अन्धे होकर, नारी-मुख की लार पियें ।
योग्य-अयोग्य विवेक रहित नर, के बारे में क्या बोलें॥
वचनाडम्बर से जो कविगण, चन्द्रसमान कहें मुख को ।
सज्जन के सम्मुख वे कवि भी, नहीं कदापि प्रशंसा योग्य॥
अन्वयार्थ : राग से अन्धे होकर लोक बड़े आदर से स्त्री के मुख की लार का पान करते हैं । कार्य तथा अकार्य के विचार से रहित जिसका मन है - ऐसे लोक के विषय में हम क्या कहें? तथा वे कवि भी सराहना योग्य नहीं हैं कि जो सज्जनों के सामने चाम से ढका हुआ है कपाल जिसका' - ऐसे स्त्री-मुख को अपने प्रबल वाणी के आडम्बर से चन्द्रमा के समान कहते हैं ।