
एष स्त्रीविषये विनापि हि पर,-प्रोक्तोपदेशं भृशं;
रागान्धो मदनोदयादनुचितं, किं किं न कुर्याज्जन: ।
अप्येतत्परमार्थबोधविकल:, प्रौढं करोति स्फुरत्;
शृङ्गारंप्रविधाय काव्यमसकृत्, लोकस्य कश्चित्कवि: ॥17॥
लोक, राग में अन्धा होकर, बिना मिले कोई उपदेश ।
कामातुर हो नारी के संग, क्या नहिं अनुचित कार्य करे ?
तो भी जो परमार्थ शून्य वे, कवि निरन्तर रचते काव्य ।
जन-जन को वे चतुर बनाते, भरते उसमें रस शृंगार॥
अन्वयार्थ : राग से अन्धा यह जगत्, परोपदेश के बिना ही कामोदय के वश होकर क्या-क्या अनुचित कार्य नहीं करता? अर्थात् समस्त अनुचित कार्यों को करता है । इतने पर भी जिसको अंश मात्र भी परमार्थ का ज्ञान नहीं - ऐसे कोई-कोई कवि, भली-भाँति शृंगार के वर्णन से युक्त काव्य बना कर, अन्य लोगों को निरन्तर चतुर बनाते रहते हैं ।