
दारार्थादिपरिग्रह: कृतगृह, व्यापारसारोऽपि सन्;
देव: सोऽपि गृही नर: परधन,-स्त्रीनिस्पृह: सर्वदा ।
यस्य स्त्री न तु सर्वथा न च धनं, रत्नत्रयालंकृतो;
देवानामपि देव एव स मुनि:, केनाऽत्र नो मन्यते ॥18॥
नारी-अर्थ का परिग्रह अरु, गृह-सम्बन्धी व्यापार जिसे ।
परधन-नारी से यदि निस्पृह, तो उसको भी देव कहें॥
नहीं सर्वथा धन-नारी संग, रत्नत्रय से भूषित हैं ।
देवों में भी देव मुनीश्वर, कौन नहीं उनको माने ?
अन्वयार्थ : जिस पुरुष को स्त्री का परिग्रह मौजूद है, धन का परिग्रह मौजूद है तथा जिसने समस्त गृह-सम्बन्धी व्यापार किया है - ऐसा गृहस्थ मनुष्य भी यदि पर-धन तथा पर-स्त्री में निस्पृह है तो वह भी देव कहा जाता है तो फिर जिस मुनि के न तो स्त्री है और न सर्वथा धन ही है तथा जो सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्रस्वरूप रत्नत्रय से शोभित हैं, वे तो देवों के भी देव हैं और उन मुनि की सब ही प्रतिष्ठा करते हैं ।