
कामिन्यादि विनात्र दु:खहतये, स्वीकुर्वते तच्च ये;
लोकास्तत्र सुखं पराश्रिततया, तद्दु:खमेव धु्रवम् ।
हित्वा तद्विषयोत्थमन्तविरसं, स्तोकं यदाध्यात्मिकं;
तत्तत्त्वैकदृशां सुखं निरुपमं, नित्यं निजं नीरजम् ॥19॥
कामजन्य दु:ख-नाश हेतु जो, करते नारी को स्वीकार ।
किन्तु पराश्रित होने से वह, सुख भी दु:ख है करो विचार॥
विषयोत्पन्न विरस किञ्चित् सुख, से विहीन जो आत्मानन्द ।
तत्त्वज्ञानियों को ही अनुपम, दोष-रहित वह नित्यानन्द॥
अन्वयार्थ : स्त्री आदि के बिना संसार में दु:ख होता है - यह समझ कर, लोग दु:ख को दूर करने के लिए स्त्री आदि को स्वीकार करते हैं; परन्तु स्त्री आदि में जो सुख है सो पराधीनता के कारण दु:ख ही है, इसलिए अन्त में विरस तथा जो विषय से उत्पन्न थोड़ा सुख है, उसको छोड़ कर, तत्त्वज्ञानियों का आत्म-सम्बन्धी सुख ही सच्चा सुख है । वही सुख उपमा रहित, सदाकाल रहने वाला, आत्मीक तथा निर्दोष है - ऐसा समझना चाहिए ।