+ पुण्यवान् मनुष्यों द्वारा भी यतीश्वरों को नमस्कार -
सौभाग्यादिगुणप्रमोदसदनै:, पुण्यैर्युतास्ते हृदि;
स्त्रीणां ये सुचिरं वसन्ति विलसत्, तारुण्यपुण्यश्रियाम् ।
ज्योतिर्बोधमयं तदन्तरदृशा, कायात्पृथक् पश्यताम्;
येषां ता न तु जातु तेऽपि कृतिन:, तेभ्यो नम: कुर्वते ॥20॥
पुण्योदय से जिन्हें प्राप्त, सौभाग्य और आनन्द विलास ।
तरुण मनोहर सुन्दर नारी, के उर में चिरकाल निवास॥
ऐसे पुण्यात्मा मनुष्य भी, उन मुनियों को नमन करें ।
जिनके उर नहिं बसें नारियाँ, जो शरीर को भिन्न लखें॥
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, सौभाग्यादि गुण तथा आनन्द के स्थानभूत पुण्य से सहित हैं । मनोहर यौवनावस्था से पवित्र शोभा के कारण स्त्रियों के मन में चिरकाल तक निवास करते हैं - ऐसे पुण्यवान् पुरुष, अपनी प्रसिद्ध अन्तर्दृष्टि से सम्यग्ज्ञानमय तेज को शरीर से जुदा देखते हैं और जिनके पास स्त्री फटकने तक नहीं पाती - ऐसे मुनीश्वरों को नमस्कार करते हैं ।