+ मनुष्य भव से ही मोक्ष की प्राप्ति -
दुष्प्रापं बहुदु:खराशिरशुचि, स्तोकायुरल्पज्ञता-;
ऽज्ञातप्रान्तदिन: जराहतमति:, प्रायो नरत्वं भवे ।
अस्मिन्नेव तपस्तत: शिवपदं, तत्रैव साक्षात्सुखं;
सौख्यार्थीति विचिन्त्य चेतसि तप:, कुर्यान्नरो निर्मलम् ॥21॥
दुर्लभ नरभव दु:खसागर है, अशुचि और अल्पायु सहित ।
अल्पज्ञान है मरण अनिश्चित, वृद्धावस्था में मति-भ्रष्ट॥
ऐसे नरभव में ही तप है, जो अनन्त शिव-सुख-आधार ।
यह विचार कर सुखवाच्छक नर, निर्मल तप धर हों भवपार॥
अन्वयार्थ : इस संसार में नरभव, बहुत दु:खों का समूह है; इसमें अपवित्रता तथा आयु की कमी है । ज्ञान थोड़ा होने से अन्तिम दिन का निश्चय नहीं है अर्थात् 'मरण कब होगा?' - यह बात मालूम नहीं है तथा बुद्धि भी वृद्धावस्था से नष्ट है; तथापि उत्तम तप एवं मोक्षपद की प्राप्ति, इसी नरभव से होती है, वही साक्षात् सुख का कारण है; इसलिए अपने चित्त में भलीभाँति ऐसा विचार करो कि जो मनुष्य, उत्तम सुख की प्राप्ति के अभिलाषी हैं; उनको अवश्य ही निर्मल तप करना चाहिए ।