
उक्तेयं मुनिपद्मनन्दिभिषजा, द्वाभ्यां युताया: शुभा:;
सद्वृत्तौषधिविंशतेरुचितवा,-गर्थाम्भसा वर्तिता ।
निर्ग्रन्थै: परलोकदर्शनकृते, प्रोद्यत्तपोवार्धकै:;
चेतश्चक्षुरनङ्गरोगशमनी, वर्ति: सदा सेव्यताम् ॥22॥
बाइस छन्दौषधि में घोले, योग्य वचन अरु अर्थ सुनीर ।
पद्मनन्दि मुनि वैद्य विनिर्मित, ब्रह्मचर्य की रक्षावर्ति ॥
सेवन करो! वर्ति यह शामक, चित्-चक्षु का काम-कुरोग ।
उत्तम तप से वृद्धिंगत, निर्ग्रन्थ करें दर्शन परलोक॥
अन्वयार्थ : श्री पद्मनन्दि नामक वैद्य द्वारा, दो से सहित विंशति अर्थात् बाईस श्लोकों में उचित वचन तथा अर्थरूपी जल से श्रेष्ठ छन्दरूप औषधि से युक्त यह शुभ सलाई बनाई है, इसलिए जो सभी प्रकार के परिग्रहों से रहित निर्ग्रन्थ हैं और उन्नत तप से वर्धान अर्थात् अत्यन्त तपस्वी हैं; उनको मनरूपी नेत्र में स्थित कामरूपी रोग को शान्त करने वाली यह सलाई, परलोक के दर्शन के लिए अवश्य ही सेवनीय है ।