
जय उसह णाहिणंदण, तिहुवणणिलएक्कदीव तित्थयर ।
जय सयलजीववच्छल, णिम्मलगुणरयणणिहि णाह ॥1॥
जय ऋषभ! नाभिनन्दन! त्रिभुवननिलयैकदीप तीर्थंकर !
जय सकलजीववत्सल! निर्मलगुणरत्ननिधे नाथ !
नाभिराय के पुत्र ऋषभ, त्रिभुवन-दीपक तीर्थंकर जय !
सकल जीव-वत्सल के धारी,जयवन्तो गुणरत्न-निलय !
अन्वयार्थ : श्रीमान् नाभिराजा के पुत्र, ऊर्ध्वलोक-मध्यलोक-अधोलोकरूपी घर के दीपक तथा धर्मतीर्थ की प्रवृत्ति करने वाले हे ऋषभदेव भगवान! आप इस लोक में सदैव जयवन्त रहो । इसी प्रकार समस्त जीवों पर वात्सल्य को धारण करने वाले और निर्मल गुणरूपी रत्नों के आकर हे नाथ! आप सदैव इस लोक में जयवन्त रहो ।