
सयलसुरासुरमणिमउड,-किरणकब्बुरियपायपीढ तुं ।
धण्णा पेच्छंति थुणंति, जवंति झायंति जिणणाह ॥2॥
सकलसुरासुरमणिमुकुट,-किरणै: कुर्वरितपादपीठ त्वां ।
धन्या: प्रेक्षन्ते स्तुवन्ति, जपन्ति ध्यायन्ति जिननाथ !
सकल सुरासुर मुकुट सुमणियों, से चित्रित जिनका आसन ।
दर्शन-स्तुति करें जाप अरु, ध्यान धरें जो नर वे धन्य !
अन्वयार्थ : समस्त सुर-असुरों के चित्र-विचित्र मणियों से युक्त मुकुटों की किरणों से कुर्वरित चित्र-विचित्र है सिंहासन जिनका - ऐसे हे जिननाथ! जो मनुष्य, आपको देखते हैं, आपकी स्तुति करते हैं तथा आपका जप और ध्यान करते हैं; वे मनुष्य धन्य हैं ।