
चम्मच्छिणा वि दिट्ठे, तइ तइलोये ण माइ महहरिसो ।
णाणच्छिणा उणो जिण, ण याणिमो किं परिप्फुरइ ॥3॥
चर्माऽक्ष्णाऽपि दृष्टे, त्वयि त्रैलोक्ये न माति महाहर्ष: ।
ज्ञानाऽक्ष्णा पुनर्जिन!, न जानीम: किं परिस्फुरति॥
चर्म-चक्षु से लखें आपको, हर्ष समाये नहीं त्रिलोक ।
तो फिर ज्ञान-चक्षु से देखें, तो कितना आनन्द न हो॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! हे भगवान्! यदि हम आपको चर्म की आँख से देख लें तो भी हमें इतना भारी हर्ष होता है कि वह तीन लोक में नहीं समाता; फिर यदि आपको ज्ञानरूपी नेत्र से देखें तो हम कह ही नहीं सकते कि हमें कितना आनन्द होगा?