
तं जिण णाणमणंतं, विसईकयसयलवत्थुवित्थारं ।
जो थुणइ सो पयासइ, समुद्दकहमवडसालूरो ॥4॥
त्वां जिन ज्ञानमनन्तं, विषयीकृतसकलवस्तुविस्तारं ।
य: स्तौति स प्रकाशयति, समुद्रकथामवटसालूर:॥
जिनका ज्ञान अनन्त और, जाननहारा है सब जग का ।
उनकी स्तुति करना मानो, मेंढक कहता सिन्धु-कथा॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! जो पुरुष, 'नहीं है अन्त जिसका और जिसने समस्त वस्तुओं के विस्तार को विषय कर लिया है' - ऐसे ज्ञानस्वरूप आपकी स्तुति करता है, वह कुएँ के मेंढ़क के समान समुद्र की कथा का वर्णन करता है ।