
अम्हारिसाण तुह गोत्त,-कित्तणेण वि जिणेस संचरइ ।
आएसं मग्गंती, पुरओ हियइच्छिया लच्छी ॥5॥
अस्मादृशानां तव, गोत्र-कीर्तनेनाऽपि जिनेश! संचरति ।
आदेशं मार्गयन्ति, पुरतो हृदयेप्सिता लक्ष्मी:॥
हे जिनेन्द्र! मुझ जैसे लघु-धी, करें आपका यदि गुणगान ।
मन-वाञ्छित लक्ष्मी भी सन्मुख, आज्ञा माँगे करे नमन॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! हे प्रभो! आपके नामरूपी कीर्तन मात्र से ही, हम सरीखे मनुष्यों के सामने आज्ञा को माँगती हुई, मनोवाञ्छित लक्ष्मी गमन करती है ।