+ जिनेन्द्र के अवतरण के बाद स्वर्ग शोभाविहीन -
जासि सिरी तइ संते, तुव अवयणमित्तिये णठ्ठा ।
संके जणियाणिठ्ठा, दिट्ठा सव्वट्ठसिद्धा वि ॥6॥
आसीत् श्री: त्वयि सति, त्वयि अवतीर्णे नष्टा ।
शंके जनिताऽनिष्टा, दृष्टा सर्वार्थसिद्धावपि॥
प्रभु सर्वार्थसिद्धि से आकर, भूतल पर अवतार लिया ।
तो वियोग के दुख से नष्ट, हुई स्वर्गों की सब शोभा॥
अन्वयार्थ : हे सर्वज्ञ! हे जिनेश! जिस समय आप सर्वार्थसिद्धि विमान में थे, उस समय उस विमान की जैसी शोभा थी, वह आपके इस पृथ्वीतल पर उतरने के बाद आपके वियोग से उत्पन्न हुए दु:ख से नष्ट हो गई - ऐसी मैं (ग्रन्थकार) शंका (अनुान) करता हूँ ।