+ इस पृथ्वीतल की शोभा अधिक बढ़ गई । -
पृथ्वी के 'वसुमति' नाम की सार्थकता
णाहिघरे वसुहारा, वडणं चं सुइरमहि तुहोयरणा ।
आसि णहाहि जिणेसर, तेण धरा वसुई जाया ॥7॥
नाभिगृहे वसुधारा,-पतनं यत् सुचिरं महीमवतरणात् ।
आसीत् नभसो जिनेश्वर! तेन धरा वसुती जाता॥
प्रभु ने जब अवतार लिया, तब नाभि नृपति के घर चिरकाल ।
धन-वर्षा होती थी नभ से, अत: वसुमति हुई धरा॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश्वर! जिस समय आप इस पृथ्वीतल पर उतरे थे, उस समय नाभिराजा के घर में बहुत काल तक आकाश से धनवर्षा हुई थी, जिसके कारण हे प्रभो! यह पृथ्वी 'वसुति' नाम से (वसु अर्थात् धन) प्रसिद्ध हुई है ।