+ माता मरुदेवी की महानता -
सच्चियसुरणवियपया, मरुएवी पहु ठिऊसि जं गब्भे ।
पुरऊ पट्ठो बज्झइ, मज्झे से पुत्तवंत्तीणं ॥8॥
शचिसुरनमितपदा, मरुदेवी प्रभो! स्थितोऽसि यद्गर्भे ।
पुरत: पट्ठो बध्यते, मध्ये तस्या: पुत्रवतीनाम्॥
मरुदेवी के गर्भ रहे प्रभु, हुआ मात-पद शचि-सुर वन्द्य ।
जग की पुत्रवती महिलाओं, में उनका पद सर्वप्रथम॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र प्रभो! आप मरुदेवी माता के गर्भ में स्थित हुए थे, इसलिए मरुदेवी माता, इन्द्राणी तथा देवों से नमस्कार योग्य हुई थीं; अत: जितनी पुत्रवती स्त्रियाँ हैं, उन सबमें मरुदेवी का ही पद सबसे प्रथम है ।