
अंकत्थे तइ दिट्ठे, जंतेण सुरालयं सुरिंदेण ।
अणिमेसत्तबहुत्तं, सयलं णयणाण पडिवण्णं ॥9॥
अंकस्थे त्वयि दृष्टे, गच्छता सुरालयं सुरेन्द्रेण ।
अनिमेषत्वबहुत्वं, सफलं नयनानां प्रतिपन्नम्॥
प्रभो! आपको गोद बिठा कर, इन्द्र मेरु की ओर चला ।
तब नेत्रों का पलक रहितपन, अरु सहस्रपन सफल हुआ॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र प्रभो! जिस समय इन्द्र आपको लेकर मेरुपर्वत की ओर चला था और जब आपको अपनी गोद में बैठे हुए देखा था; उस समय उसके नेत्रों का निमेष से रहितपना तथा बहुतपना सफल हुआ था ।