
तित्थत्तणमावण्णो, मेरू तुह जम्मण्हाणजलजोए ।
तत्तस्स सूरपमुहा, पयाहिणं जिण कुणंति सया ॥10॥
तीर्त्थत्वमापन्नो, मेरुस्तव जन्मस्नानजलयोगेन ।
तत् तस्य सूरप्रमुखा:, प्रदक्षिणां जिन! कुर्वन्ति सदा॥
प्रभु के जन्म-स्नान सुजल से, मेरु तीर्थ को प्राप्त हुआ ।
अत: मेरु की चन्द्र-सूर्य भी, करें निरन्तर प्रदक्षिणा॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! जिस समय आपका जन्म-स्नान , मेरुपर्वत पर हुआ था, उस समय उस स्नान-जल के सम्बन्ध से मेरुपर्वत भी तीर्थपने को प्राप्त हुआ था अर्थात् तीर्थ बना था; इसी कारण हे जिनेन्द्र! उस मेरुपर्वत की सूर्य, चन्द्रमादि सभी ग्रह सदैव प्रदक्षिणा करते रहते हैं ।