+ मेरुपर्वत पर प्रभु के जन्माभिषेक का साक्षात् दृश्य -
मेरुसिरे पडणुच्छलिय,-णीरताडणपणट्ठदेवाणं ।
तं वित्तं तुह ण्हाणं, तह जह णहमासियं किण्णं ॥11॥
मेरुशिरसि पतनोच्छलन-नीरताडनप्रनष्टदेवानाम् ।
तद्वृत्तं तव स्नानं, तथा यथा नभाश्रितं कीर्ण्॥
मेरु शीष पर स्नान हुआ तो, जल उससे गिर कर उछला ।
जल ताडित-पीड़ित देवों से, नभमण्डल सब व्याप्त हुआ॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र प्रभो! मेरुपर्वत के मस्तक पर आपका स्नान होने पर, जल-पतन से उछलते हुए जल के ताड़न से अत्यन्त दु:खी, उन देवों की ऐसी दशा हुई, मानों उनकी आवाज के कारण चारों ओर से आकाश ही व्याप्त हो गया हो ।