+ कल्पवृक्षों के अभाव में प्रजाजनों की आजीविका कैसे? -
जाण बहुएहिं वित्ती, जाया कप्पद्दुमेहिं तेहिं विणा ।
एक्केण वि ताण तए, पयाण परिकप्पिया णाह ॥13॥
यासां बहुर्भिवृत्ति:, जाता कल्पद्रुमै: तैर्विना ।
एकेनापि तासां, त्वया प्रजानां परिकल्पिता नाथ !
आजीविका प्रजा की होती थी प्रभु! कल्पवृक्ष द्वारा ।
जब वे नष्ट हुए तो होने, लगी आपके ही द्वारा॥
अन्वयार्थ : हे प्रभु! पूर्व में प्रजाजनों की आजीविका, बहुत से कल्पवृक्षों के माध्यम से होती थी; उन कल्पवृक्षों के अभाव में, उन प्रजाजनों की आजीविका आप अकेले ने ही की ।