+ पृथ्वी की सनाथता कब और कैसे? -
पहुणा तए सणाहा, धरा सि तीए कहं णहो वूढो ।
णवघणसमयसमुल्लसिय,-सासछम्मेण रोंचो ॥14॥
प्रभुणा त्वया सनाथा, धरा आसीत् तस्या: कथमहोवृद्ध: ।
नवघनसमयसमुल्लसित,-श्वासच्छद्मना रोांच:॥
प्रभो! आपने ही पृथ्वी को, नहीं किया था यदि सनाथ ।
तो नव-मेघ काल में श्वासोच्छ्वास रूप में क्यों रोमाञ्च ?
अन्वयार्थ : हे जिनेश प्रभो! आपने ही यह पृथ्वी सनाथ की क्योंकि यदि ऐसा न होता तो नवीन मेघ के समय होने वाले श्वासोच्छ्वास के बहाने इसमें रोांच कैसे हुए होते?