
विज्जुव्व घणे रंगे, दिट्ठपणट्ठा पणच्चिरी अमरी ।
जइया तइया वि तए, रायसिरी तारिसी दिट्ठा ॥15॥
विद्युदिव घने रंगे, दृष्टप्रणष्टा प्रनृत्यन्ती अमरी ।
यदा तदापि त्वया, राज्यश्री: तादृशी दृष्टा॥
रंगभूमि में विद्युत् सम, नर्तकी नष्ट होती देखी ।
प्रभु ने तत्क्षण राज्यलक्ष्मी, भी चञ्चल होती देखी॥
अन्वयार्थ : हे प्रभु! जिस प्रकार मेघ में बिजली प्रकट होते ही नष्ट हो जाती है, उसी प्रकार आपने नृत्य करती हुई नीलांजना नाम की देवांगना को पहले देखा, पश्चात् नष्ट होते हुए भी देखा तथा उसी समय आपने राज्य-लक्ष्मी को भी उसके समान ही चञ्चल समझ लिया ।