
वेरग्गदिणे सहसा, वसुहा जुण्णं तिणं व जं मुक्का ।
देव!तए सा अज्ज वि, विलवइ सरिजलरवा वराई ॥16॥
वैराग्यदिने सहसा, वसुधा जीर्णतृणमिव यत् मुक्ता ।
देव!त्वया सा अद्यापि, विलपति सरिज्जलमिषेण वराकी॥
प्रभु को जब वैराग्य हुआ, जीरण तृण-सम वसुधा त्यागी ।
तबसे अब तक दीन हीन भू, सरिताओं के मिस1 रोती॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश प्रभो! जिस दिन आपको वैराग्य हुआ था, उसी दिन से आपने यह पृथ्वी पुराने तृण के समान छोड़ दी थी; अत: तबसे यह बेचारी दु:खी पृथ्वी, इस समय भी नदी के बहाने से विलाप कर रही है ।