
अइसोइओ सि तइया, काउस्सग्गट्ठिओ तुं णाह ।
धम्मिक्कघरारंभे, उज्झीकय मूलखंभो व्व ॥17॥
अतिशोभितोऽसि तदा, कायोत्सर्गस्थितस्त्वं नाथ !
धर्मैकगृहारम्भे, ऊर्ध्वीकृत मूलस्तम्भ इव॥
अतिशय शोभित हुए नाथ! जब, कायोत्सर्ग सहित राजे ।
धर्म-सदन निर्माण हेतु प्रभु, मूलस्तम्भ समान हुए॥
अन्वयार्थ : हे भगवान्! जिस समय आप कायोत्सर्ग सहित विराजमान थे, उस समय धर्मरूपी घर के निर्माण में उन्नत मूलस्तम्भ के समान आप अत्यन्त सुशोभित होते थे ।