+ देखो जी, आदीश्वर स्वामी! कैसा ध्यान लगाया है -
हिययत्थझाणसिहिओज्झमाण सहसा सरीरधूो व्व ।
सोहइ जिण तुह सीसे, महुयरकुलसंणिहो केसभरो ॥18॥
हृदयस्थ-ध्यान-शिखि-दह्यमान-शीघ्रं शरीर-धू्रवत् ।
शोभते जिन! तव शिरसि, मधुकरकुलसन्निभ: केशसमूह:॥
ध्यान-अग्निजल रही हृदय में, जिससे प्रभो! शरीर जला ।
भ्रमर समान केश मस्तक पर, शोभित मानो उड़े धुँआ॥
अन्वयार्थ : हे प्रभु!आपके मस्तक पर भौंरों के समूह समान काला, जो केशसमूह है, वह हृदय में स्थित ध्यानरूपी अग्नि से शीघ्र जलाये हुए शरीर के धुएँ समान शोभित होता है ।