
कम्मकलंकचउक्के, णट्ठे णिम्मलसमाहिभूईए ।
तुह णाणदप्पणेच्चिय, लोयालोयं पडिप्फलियं ॥19॥
कर्मकलंकचतुष्के नष्टे निर्मलसमाधिभूत्या ।
तव ज्ञानदर्पणेऽर्च्य! लोकालोकं प्रतिबिम्बितम्॥
नाथ! हुए निर्मल समाधि से, कर्म-कलंक चतुष्टय नष्ट ।
तभी आपके ज्ञान-मुकुर में, लोकालोक हुए बिम्बित॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! निर्मल समाधि के प्रभाव से चार घातिया कर्मों के नष्ट होने पर, आपके सम्यग्ज्ञानरूपी दर्पण में यह लोकालोक प्रतिबिम्बित हो रहा है ।