
आवरणाईणि तए, समूलमुम्मूलियाइ दट्ठूण ।
कम्मचउक्केण मुअं, व णाह भीऐण सेसेण ॥20॥
आवरणादीनि त्वया, समूलमुन्मूलितानि दृष्ट्वा ।
कर्मचतुष्केण मृतवत्, नाथ! भीतेन शेषेण॥
प्रभो! आपने चार घातिया, कर्म समूल विनष्ट किये ।
उन्हें देख कर भय से कर्म, अघाती मृतक समान हुए॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! जिस समय आपने ज्ञानावरणादि घातिया कर्मों का जड़ सहित सर्वथा नाश कर दिया था; उस समय उन सर्वथा नष्ट ज्ञानावरणादि कर्मों को देख कर, शेष चार अघातिया कर्म भी भय के कारण आपकी आत्मा में मृतदेह के समान स्थित रहे ।