+ समवसरण में मुनियों के बीच प्रभु की विद्यमानता -
णाणामणिणिम्माणे, देव ठिओ सहसि समवसरणम्मि ।
उवरिव्व सण्णिविट्ठो, जियाण जोईण सव्वाणं ॥21॥
नानामणिनिर्माणे, देव! स्थित: शोभते समवसरणे ।
उपरि इव सन्निविष्ट:, यावतां योगिनां सर्वेषाम्॥
प्रभु! नाना मणियों से निर्मित, समवसरण में शोभित हैं ।
जितने मुनिवर समवसरण में, उनमें सर्वोपरि बैठे॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! जिस समवसरण की रचना, चित्र-विचित्र मणियों से की गई थी, उस समवसरण में विद्यमान जितने भी मुनि थे, उन समस्त मुनियों के ऊपर विराजमान आप अत्यन्त शोभा को प्राप्त होते थे ।