+ समवसरण की लोकोत्तर शोभा -
लोउत्तरा वि सा समवसरणसोहा जिणेस तुह पाये ।
लहिऊण लहइ महिमं, रविणो णलिणिव्व कुसुमट्ठा ॥22॥
लोकोत्तराऽपि सा, समवशरणशोभा जिनेश! तव पादौ ।
लब्ध्वा लभते महिमानं, रवे: नलिनीव कुसुस्था॥
यथा कमल में रवि-किरणों से, आती है अतिशय शोभा ।
प्रभु के चरण-कमल को पाकर, समवसरण की श्रेष्ठप्रभा॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो ! जिस प्रकार पुष्प में स्थित कमलिनी, सूर्य की किरणों को पाकर और भी अधिक महिमा को प्राप्त होती है; उसी प्रकार समवसरण की शोभा, स्वभाव से ही लोकोत्तर होती है, तथापि हे जिनेन्द्र! आपके चरण-कमलों को पाकर वह और भी अत्यन्त महिमा को धारण करती है ।