+ प्रभु की निर्दोषता एवं निष्कलंकता, फिर भी चन्द्रमा की उपमा -
णिद्दोसो अकलंको, अजडो चंदोव्व सहसि तं तहवि ।
सीहासणायलत्थो, जिणंद कयकुवलयाणंदो ॥23॥
निर्दोष: अकलंक:, अजड: चन्द्रवत् शोभते तथापि ।
सिंहासनाचलस्थ:, जिनेन्द्र! कृतकुवलयानन्द:॥
प्रभो! आप निर्दोष अजड़, अकलंक किन्तु हो चन्द्र समान ।
शोभित अचल सिंहासन पर, भूमण्डल को देते आनन्द॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र प्रभो! आप यद्यपि निर्दोष, अकलंक और अजड़ हैं तो भी अचल सिंहासन में स्थित कुवलय को आनन्दित करने वाले चन्द्रमा के समान शोभित होते हैं ।