
अच्छंतु ताव इयरा, फुरियविवेया णमंतसिरसिहरा ।
होइ असोहो रुक्खो, वि णाह तुह संणिहाणत्थो ॥24॥
आस्तां तावत् इतरा, स्फुरितविवेका: नम्रशिर: शिखरा: ।
भवति अशोको वृक्ष:, अपि नाथ! तव सन्निधानस्थ:॥
नतमस्तक हो नमन करें, उन भव्य ज्ञानियों की क्या बात ?
अति आश्चर्य कि प्रभु समीप में, जड़तरु भी अशोक हो जात॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! जिन भव्य जीवों की ज्ञान-ज्योति स्फुरायमान है और जो आपको मस्तक झुका कर नमस्कार करते हैं, वे तो दूर ही रहें, किन्तु हे भगवन्! आपके समीप रहता हुआ जड़ वृक्ष भी अ-शोक हो जाता है, 'अशोक' कहलाता है ।