+ प्रभु दर्शन के समय भव्य जीवों के अश्रुपात का कारण -
छत्तत्तयमालंबिय,-णिम्मल मुत्ताहलच्छला तुज्झ ।
जणलोयणेसु वरिसइ, अमयं पि व णाह बिंदूहिं ॥25॥
छत्रत्रयमालम्बित,-निर्मलमुक्ताफलच्छलात् तव ।
जनलोचनेषु वर्षति, अमृतमिव नाथ! बिन्दुभि:॥
तीन छत्र में लटक रहे जो, निर्मल मुक्ताफल अनुपम ।
अमृत-वर्षा करें भव्य-लोचन में - ऐसा हो मालूम॥
अन्वयार्थ : हे भगवान्! आपके ऊपर लटकते हुए ये तीनों छत्र, निर्मल मुक्ताफल के बहाने मनुष्यों की आँखों में बिन्दुओं (अश्रुओं) से अमृत की वर्षा करते हैं - ऐसा लगता है ।