+ प्रभु के ऊपर इन्द्रों द्वारा चँवर ढोरने का अतिशय -
कयलोयलोयणुप्पल,-हरिसाइ सुरेसहत्थचलियाइं ।
तुह देव सरयससहरकिरणकयाइव्व चमराय ॥26॥
कृतलोकलोचनोत्पल,-हर्षाणि सुरेशहस्तचलितानि ।
तव देव! शरच्छशधर,-किरणकृतानि इव चमराणि॥
प्रभो! ढोरते चँवर इन्द्र, जिनसे हर्षित जन-नेत्र-कमल ।
शरद ऋतु की चन्द्र-किरण से, मानो निर्मित हुए चँवर॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! जिन चँवरों को देखने से समस्त लोक के नेत्ररूपी कमल अत्यन्त हर्षित हुए हैं और जिनको बड़े-बड़े इन्द्र ढ़ोरते हैं - ऐसे आपके चँवर, शरदऋतु के चन्द्रमा की किरणों से बनाये गये हैं - ऐसा मालूम होता है ।