
विहलीकयपंचसरो पंचसरो जिण! तुम्मि काऊण ।
अमरकयपुप्फविट्ठी, छला इव बहु मुअइ कुसुसरो ॥27॥
विफलीकृतपंचशर:, पंचशरो जिन! त्वयि कृत्वा ।
अमरकृतपुष्पवृष्टिच्छलाद् इव बहून् मुञ्चति कुसुशरान्॥
प्रभो ! आपने किया काम के, पाँचों बाणों को असफल ।
पुष्पवृष्टि से भासित होता, काम त्याग करता निजबाण॥
अन्वयार्थ : हे भगवान् जिनेन्द्रदेव! आपके सामने जिस कामदेव के पाँचों बाण विफल हो गये हैं - ऐसा वह कामदेव, देवों द्वारा आपके ऊपर की हुई जो पुष्पों की वर्षा, उसके बहाने से मानो अपने पुष्पबाणों का त्याग कर रहा है - ऐसा मालूम होता है ।