+ दुन्दुभि-नाद की घोषणा -
एस जिणो परमप्पा, णाणोण्णाणं सुणेह मा वयणं ।
तुह दुंदुही रसंतो, कहइ व तिजयस्स मिलियस्स ॥28॥
एष जिन: परमात्मा, नान्योऽन्येषां श्रुणुत मा वचनम् ।
तव दुन्दुभि: रसन्, कथयति इव त्रिजगत: मिलितस्य॥
त्रिभुवन को एकत्रित कर, कह रही दुन्दुभी यह मानो ।
जिन-परमात्मा अन्य नहीं, तो नहीं अन्य के वचन सुनो॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! आपकी बजती हुई दुन्दुभि (नगाड़ा) तीनों लोक में यह बात कहती है कि ''हे जीवों! वास्तविक परमात्मा तो भगवान आदिनाथ ही हैं; इनसे भिन्न कोई परमात्मा नहीं है, इसलिए तुम दूसरे का उपदेश मत सुनो, इन्हीं का उपदेश सुनो ।''