+ प्रभु का प्रभासमूह, सन्ताप एवं जड़ता, दोनों का नाशक -
रविणो संतावयरं, ससिणो उण जड्डयाअरं देव ।
संतावजडत्तहरं, तुम्हच्चिय पहु पहावलयं ॥29॥
रवे: सन्तापकरं, शशिन: पुन: जडताकरं देव !
सन्तापजडत्वहरं, तवार्चितं प्रभो प्रभावलयम्॥
सूर्य-प्रभा सन्ताप करे अरु, चन्द्र-प्रभा जड़ता करती ।
किन्तु आपकी प्रभा, ताप अरु जड़ता, दोनों को हरती॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश्वर प्रभो! सूर्य का प्रभासमूह तो मनुष्यों को सन्ताप करने वाला है तथा चन्द्रमा का प्रभासमूह, जड़ता करने वाला है; किन्तु हे पूज्यवर! आपका प्रभासमूह, सन्ताप व जड़ता, दोनों का ही नाश करने वाला है ।