
मंदरमहिज्जमाणांबु,-रासिणिग्घोससण्णिहा तुज्झ ।
वाणी सुहा ण अण्णा, संसारविसस्स णासयरी ॥30॥
मन्दरमथ्यमानाम्बु-राशिनिर्घोषसन्निभा तव ।
वाणी शुभा नान्या, संसारविषस्य नाशकरी॥
मन्दरगिरि से मथन किये, सागर की गर्जन सम प्रभु वाणी ।
प्रभु की ही शुभ अन्य नहीं, संसार नाश करने वाली॥
अन्वयार्थ : हे भगवान् जिनेश! मन्दराचल से मन्थन किये गये समुद्र के निर्घोष के समान आपकी वाणी ही शुभ है, अन्य वाणी नहीं क्योंकि आपकी वाणी ही संसाररूपी विष का नाश करने वाली है, जबकि अन्य वाणी, संसार-विष का नाश नहीं करती ।