+ वाणी-श्रवण के प्रभाव से अज्ञानियों को भी उत्तम फल की प्राप्ति -
पत्ताण सारणिं पिव, तुज्झ गिरं सा गई जडाणं पि ।
जा मोक्खतरुट्ठाणे, असरिसफलकारणं होइ ॥31॥
प्राप्तांना सारिणीमिव, तव गिरं सा गति: जड़ानामपि ।
या मोक्षतरुस्थाने, असदृशफलकारणं भवति॥
हे प्रभु! क्यारी के समान, तव वाणी पाकर अज्ञानी ।
जीवों को भी शिवतरु में, अत्युत्तम फल प्राप्ति होती॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! जो अज्ञानी जीव, आपकी वाणी प्राप्त करते हैं, उन अज्ञानी जीवों की भी वही गति होती है, जो मोक्षरूपी वृक्ष के स्थान में अत्युत्तम फल प्राप्ति का कारण होती है ।