+ प्रभु के वचनों की श्रद्धा के प्रभाव से संसार-सागर पार -
पोयं पिव तुह पवयणम्मि, संलीणा फुडमहो कयजडोहं ।
हेलाए च्चिय जीवा, तरंति भवसायरमणंतं ॥32॥
पोत इव तव प्रवचने, संल्लीना स्फुटहो कृतजलौघम् ।
हेलयार्चित जीवा:, तरन्ति भवसागरमनन्तम् ॥
बहु जलराशि समान अनन्त, भवोदधि को नर पार करें ।
पोत-समान प्रभु-वचनों पर, बैठ बात ही बात में॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार उत्तम जहाज में बैठा हुआ मनुष्यों का समूह, गम्भीर समुद्र को शीघ्रता से तिर जाता हैं; उसी प्रकार हे जिनेश! जो मनुष्य, आपके वचनों में लीन हैं अर्थात् आपके वचनों पर सम्यक्श्रद्धा करते हैं, वे मनुष्य क्षणमात्र में ही संसार-सागर तिर जाते हैं ।