+ प्रभु के वचन ही अनेकान्तवाद के द्योतक -
तुह वयणं चिय साहइ, णूणमणेयंतवायवियडपहं ।
तह हिययपईवअरं, सव्वत्तणमप्पणो णाह ॥33॥
तव वचनमेव साधयति, नूनमनेकान्तवादविकटपथम् ।
तथा हृदयप्रदीपकरं, सर्वज्ञत्वमात्मनो नाथ !
अनेकान्त के विकट मार्ग को, वचन आपके ही साधें ।
हे प्रभु! केवलज्ञान आपका, भविजन हृदय प्रदीप्त करे॥
अन्वयार्थ : हे प्रभो! वास्तव में आपके वचन ही अनेकान्तवाद रूपी विकट मार्ग को सिद्ध करते हैं तथा आपका सर्वज्ञपना ही समस्त मनुष्यों के हृदय का प्रकाश करने वाला है ।