+ केवली के वचनों की परीक्षा करने में मति-श्रुतज्ञानी असमर्थ -
विप्पडिवज्जइ जो तुह गिराए मइसुइबलेण केवलिणो ।
वरदिट्ठिदिट्ठणहजंत,-पक्खिगणणेवि सो अंधो ॥34॥
विप्रतिपद्यते यस्तव गिरि मतिश्रुतिवलेन केवलिन: ।
वरदृष्टिदृष्टनभोयात,-पक्षिगणनेऽपि सोऽन्ध:॥
अपने मति-श्रुत ज्ञान कुबल से जिन वचनों में करें विवाद ।
ज्यों अन्धे पक्षी गिनने में, दृष्टिवन्त से करें विवाद॥
अन्वयार्थ : हे भगवान्! जो मनुष्य, मतिज्ञान-श्रुतज्ञान के बल से आप केवली के वचनों में विवाद करता है; वह मनुष्य, अच्छी दृष्टिवाले मनुष्य द्वारा आकाश में की गई पक्षियों की गणना में अन्धे व्यक्ति के समान संशय करता है ।