
भिण्णाण परणयाणं, एक्केक्कमसंगया णया तुज्झ ।
पावंति जयम्मि जयं, मज्झम्मि रिऊण किं चित्तं ॥35॥
भिन्नानां परनयानां, एकमेकमसंगता: नया: तव ।
प्राप्नुवन्ति जगत्त्रये जयं, मध्ये रिपूणां किं चित्रम्॥
प्रभो! आपके एक-एक नय, विजयी होते त्रिभुवन में ।
परवादी के असम्बद्ध नय, हारें क्या अचरज इसमें ?
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र भगवान्! आपके नय, परस्पर में सम्बन्ध नहीं रखने वाले भिन्न-भिन्न ऐसे परवादियों के नय रूपी वैरियों के मध्य तीनों जगत् में विनय को प्राप्त होते हैं; इसमें कोई आश्चर्य नहीं ।