
अण्णस्स जए जीहा, कस्स सयाणस्स वण्णणे तुज्झ ।
जत्थ जिण ते वि जाया, सुरगुरुपमुहा कई कुंठा ॥36॥
अन्यस्य जगति जिह्वा, कस्य सज्ञानस्य वर्णने तव ।
यत्र जिन! तेऽपि जाता:, सुरगुरुप्रमुखा: कवय: कुण्ठा:॥
प्रभो! आपके ज्ञान-कथन में, सक्षम है जिह्वा किसकी ।
क्योंकि बृहस्पति आदि कवि भी, हो जाते हैं कुण्ठित मति॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! संसार में ऐसा कौन पुरुष समर्थ है कि जिसकी जिह्वा, उत्तम ज्ञान के धारक आपका वर्णन करने में समर्थ हो? क्योंकि बृहस्पति आदि जो उत्तम कवि हैं, वे भी आपका वर्णन करने में मन्दबुद्धि सिद्ध होते हैं ।