+ आज भी रत्नत्रय के बल पर निर्विघ्नतया मोक्ष की प्राप्ति -
सो मोहथेण रहिओ, पयासिओ पहु सुपहो तए तइया ।
तेणज्जवि रयणजुआ, णिव्विग्घं जंति णिव्वाणं ॥37॥
स मोहचौररहित:, प्रकाशित: प्रभो! सुपथ: त्वया तदा ।
तेनाऽद्यापि रत्नयुता:, निर्विघ्नं यान्ति निर्वाणम्॥
मोह-चोर से रहित मार्ग का, प्रभो! आपने किया प्रकाश ।
अत: आज भी रत्नत्रय, धारी निर्विघ्न करें शिव-प्राप्त॥
अन्वयार्थ : हे प्रभु जिनेन्द्रदेव! आपने मोह-चोर से रहित उत्तम मार्ग का प्रकाश किया; इसलिए सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र के धारी भव्य जीव, इस समय भी उसी मार्ग का अवलम्बन करके बिना क्लेश के मोक्ष को चले जाते हैं ।