
उम्मुद्दियम्मि तम्मि हु, मोक्खणिहाणे गुणणिहाण तए ।
केहिं ण जुणतिणा इव, इयरणिहाणाइ भुवणम्मि ॥38॥
उन्मुद्रिते तस्मिन्, मोक्षनिधाने गुणनिधान त्वया ।
कैर्न जीर्णतृणानीव, इतरनिधानानि भुवने॥
हे गुणनिधि भगवन्! जब तुमने, खोल दिया है मोक्ष-निधान ।
कौन भव्य नहिं तजे अन्य निधि, त्रिभुवन में जीरण तृण जान॥
अन्वयार्थ : हे गुणनिधान! जिस समय आपने मोक्षरूपी खजाने को खोल दिया था, उस समय भव्य जीवों ने सड़े तृण के समान दूसरे राज्यादि निधानों को भी छोड़ दिया था ।