
मोहमहाफणिडक्को, जणो विरायं तुं पमुत्तूण ।
इयराणाए कह पहु, विचेयणो चेयणं लहइ ॥39॥
मोहमहाफणिदृष्टो, जनो विरागं त्वां प्रमुच्य ।
इतराज्ञया कथं प्रभो, विचेतनो चेतनां लभते॥
मोह-सर्प ने जिसको काटा, वह नर वीतराग को छोड़ ।
अन्य कुदेवों की आज्ञा से, कैसे उसे चेतना हो॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! जो पुरुष, मोहरूपी प्रबल सर्प से काटा गया है अर्थात् जो अत्यन्त मोही है; वह मनुष्य, समस्त प्रकार के राग से रहित आप वीतराग को छोड़ कर, अन्य कुदेवों की आज्ञा से कैसे चेतना को प्राप्त कर सकता है? अर्थात् वह कैसे ज्ञानी बन सकता है?