+ प्रभु का धर्म संसार-समुद्र में गिरने से बचाने वाला -
भवसायरम्मि धम्मो, धरइ पडंतं जणं तुहच्चेव ।
सवरस्स व परमारण-कारणमियराण जिणणाह ॥40॥
भवसागरे धर्मो, धरति पतन्तं जनं तवैव ।
शबरस्येव परमारण-कारणमितरेषां जिननाथ !
भव-सागर में पतितजनों को, धर्म आपका ही तारे ।
अन्य धर्म तो भील-धनुष सम, अज्ञानी जन को मारे॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश ! आपका धर्म ही संसाररूपी समुद्र में गिरते हुए जीवों को धारण करता है; किन्तु आपसे भिन्न जितने भी धर्म हैं, वे भील के धनुष के समान दूसरों को मारने में ही कारण हैं ।