
अण्णो को तुह पुरओ वग्गइ गुरुयत्तणं पयासंसो ।
जम्मि तइ परमियत्तं केसणहाणं पि जिण जायं ॥41॥
अन्य: क: तव पुरतो, वल्गति गुरुत्वं प्रकाशयन् ।
यस्मिन् त्वयि प्रमाणत्वं, केशनखानामपि जिन! जातम्॥
कौन पुरुष? प्रभु! तव सन्मुख, अपनी गुरुता बतला सकता ।
क्योंकि आपके केश और नख, नहीं बढ़ें लख तव गुरुता॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! जब आपके सामने केश तथा नख भी परिमित हैं अर्थात् बढ़ते नहीं, तब ऐसा कौन है कि जो आपके सामने अपनी गुरुता को प्रकाशित करता हुआ कुछ बोलने की सामर्थ्य रखता हो?